मेरा बचपन।


 मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी किसी शिक्षक या किसी सहपाठी लड़के से कोई झूठ बोला हो। मै बहुत ही संकोची स्वभाव का लड़का था।एक बार मेरे पिताजी मेरे लिए श्रवण की मातृ - पित्र भक्ति नाम की पुस्तक लाए, मैंने उसे बड़े चाव से पढ़ा, उसे पढ़कर मेरे मन में माता-पिता की सेवा का भाव कूट-कूट कर भर गया था, उन दिनों बाइस्कोप पर तस्वीर दिखाने वाले लोग आते थे, तभी मैंने अपने अंधे माता पिता को महंगी पर बिठा कर ले जाने वाले श्रवण का चित्र देखा था। इन बातों का मेरे मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा,मैंने मन ही मन ठान लिया कि मैं भी श्रवण कुमार की तरह बनूंगा।


मैंने "सत्य हरिशचंद्र" नामक नाटक भी देखा।मेरे मन में बार-बार उसे देखने की इच्छा होती थी। मुझे रात में हरिश्चंद्र के सपने आते। मेरे मन में बार-बार यही बात उठती,की सभी राजा हरिश्चंद्र की तरह सत्यवादी क्यों नहीं बने। यही बात मेरे मन में बैठ गई। चाहे हरिश्चंद्र की भांति कितने ही कष्ट क्यों ना उठाने पड़े किंतु सत्य के मार्ग को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।


मैंने पुस्तकों में पढ़ा था। की खुली हवा में घूमना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है,यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी और मैंने सैर करने की आदत डाल ली, इससे मेरा शरीर मजबूत हो गया।


एक भूल की सजा मैं आज तक पा रहा हूं।पढ़ाई में अक्षर साफ होने की आवश्यकता नहीं। यह गलत धारणा मेरे मन में इंग्लैंड जाने तक रही। आगे चलकर दूसरों के मोती जैसे अक्षर देखकर मैं बहुत पछतावा हुआ। मैंने देखा कि अक्षरों का बुरा होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है। बाद में मैंने अपने अच्छा सुधारने का बहुत प्रयास किया,किंतु पके घड़े पर कहां मिट्टी चढ़ सकती हैं?


सुलेख शिक्षा का एक आवश्यक अंग है, उसके लिए चित्र कला सीखनी चाहिए। बालक जब चित्रकला सीख, चित्र बनाना जान जाता है, तब यदि अक्षर लिखना सीखे। तो उसके अक्षर मोती जैसे ही हो जाते हैं।


अपने आचरण की ओर मैं बहुत ध्यान देता था। इसमें यदि कोई भूल हो जाती,तो मेरी आंखों में आंसू भर आते।मेरे हाथों कोई ऐसा काम हो, जिसके लिए शिक्षक मुझे दंड दे,तब यह मेरे लिए असहनीय नहीं था। मुझे याद है कि एक बार मुझे मार खानी पड़ी थी। मुझे मार का दुख नहीं था,किंतु मैं दंड का पात्र समझा गया। इस बात का दुख था, यह बात पहली या दूसरी कक्षा की है।


Note- महात्मा गांधी की आत्मकथा से।

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने